चुनौती

गठबंधन सरकार या वक्त की कमी जैसे बहाने बनाने के लिए इस बार मायावती अपना मुंह खोल नहीं सकती. अपने भाषण में बह इस तरह का रोना रोने काअधिकार नहीं रखती. उन्होंने और उनके मंत्रियों अधिकारियों ने जम कर प्रदेस का दोहन किया है. उन्होंने जम कर फिजूल खर्ची की है, लेकिन उपलब्धियां गिनाने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं है. वैसे उत्तर प्रदेश में बसपा का जनाधार है. एक वर्ग विशेष के वोट मिलने से बसपा का वोट बैंक पिछले चुनाव के समय बढ़ा है, पर इस बार वैसी उम्मीद दिख नहीं रही है.
यही हाल मुलायम सिंह के साथ है. सपा को वोट देकर और 5 साल तक उनका शासन देखने के बाद मतदाताओं की मंशा उन्हें वोट नहीं देगी ऐसा लग रहा है. कई बड़े नेता जो कभी सपा के साथ थे, वे बिदक कर मुलायम सिंह सा दामन छोड़ चुके हैं.
एक वर्ग परम्परागत रूप से कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को वोट देता रहा है. इस बार यह किधर रुख करेगा अभी स्पष्ट नहीं है. क्योंकि राहुल गांधी कई महिने पहले से उत्तर प्रदेश का लगातार दौरा कर रहे हैं और अपना जनाधार भी बढ़ाया है. वे एक-एक व्यक्ति से मिल रहे हैं. उनकी समस्याओं का हल कर रहे हैं और मायावती तथा मुलायम सिंह पर प्रहार पर प्रहार कर रहे हैं. जहाँ तक चुनावी तैयारियों का सवाल है बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने लगभग सभी प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं. कांग्रेस ने तीन चौथाई से ज्यादा प्रत्याशियों की तो उम्मीदवारों के चयन में भारतीय जनता पार्टी सबसे पीछे चल रही है. कांग्रेस ने राष्टÑीय लोक दल से तालमेल कर लिया है. इसी के चलते एक नेता को मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया है.
जहां तक चुनावी मुद्दों का सवाल है तो सभी के पास मायावती के पांच साल के कार्यकाल का भ्रष्टाचार और घन का दुरूपयोग मुद्दा बनेगा. कांग्रेस मुलायम सिंह के शासन काल में प्रदेश की जनता के हाल-बेहाल को भी याद दिलायेगी.
इन सब के बावजूद राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी परेशानी रहेगी उत्तर प्रदेश में सीटों को बढ़ाना. साथ ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का परचम लहराना. क्योंकि कांग्रेस पर चौतरफा वार हो रहा है. कभी अन्ना हजारे और उनकी टीम आगे आ जाती है तो कभी कोई और.  फिर भी जब प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कौन अगला प्रधान मंत्री बनेगा के लिए वोट कराया जाता है, तो बहुत आगे निकल जाते हैं राहुल गांधी.
राहुल गांधी के साथ प्रियंका गांधी भी है, जो सीधे-सीधे अपनी बात नहीं कहती पर  जो बात उनमें है वह अन्य किसी नेता में नहीं. उनकी छबि इंदिरा गांधी से मिलती ही नहीं उन्हीं की तरह निर्णय लेने और देश को विकास की राह में कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है, कर गुजरने की क्षमता है. वे अपने भाई के लिए जी तोड़ मेहनत उ.प्र. चुनाव में करेंगी और इस आधार पर वहां कांग्रेस को बढ़त मिलेगी. इससे अन्ना और उनकी टीम सहित भाजपा की बोलती बंद होगी. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने चुनाव बाद गठबंधन का विकल्प खुला रखा है, जो इन्हें राहत की सांस लेने देगी. रही बाद भाजपा की तो उ.प्र. में इस पार्टी का भगवान मालिक है.

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