बेटी जंजीर में

दुर्ग जिले के कुसमी निवासी 54 साल के बरतिया मेहर, उनकी पत्नी मुन्नी बाई मेहर और बेटी गिरजा सिर्फ इसलिए बेघर-बार होकर जिल्लत की जिन्दगी बसर कर रहे हैं क्योंकि गिरजा (25 वर्ष) मानसिक रप से अस्वस्थ्य है, जिसे प्रेत बाधा होना बता कर एक बाबा द्वारा दिए गये जंजीर से जकड़ दिया गया है. गिरजा का बचपन तो ठीक-ठाक गुजर गया पर जब गिरजा 13 साल की हुई और जब-तब उसे दौरा पड़ने लगा तो गांववालों ने उसे जादू-टोना होना और बाबा-पीर के पास बाधा दूर करने की सलाह दी. यह परिवार गांववालों से भी प्रताड़ित होता रहा, क्योंकि गिरजा को कभी भी दौरा पड़ जाता था और वह हिंसक हो जाती है. गरीब और अशिक्षित बरतिया और मुन्नी बाई ने इलाज के लिए सहारा लिया बैगा-गुनिया का. इन सब के चलते आज तीन जिन्दगी कष्ट उठा रही है और सहानुभूति से मिले अन्न या चंद सिक्कों से अपने खाने-पीने का जुगाड़ कर रहा है. 12 साल से गिरजा एक जंजीस से बंधी हुई है, जिसका एक सिरा उसके पिता थामे रहते हैं. दुख होता है कि इतने समाज सेवी संगठन रायपुर में हैं, जो सांस्कृतिक कार्यक्रम करा उन्हें इनाम बांट कर विभिन्न अखबारों में जगह  बना समाज सेवा का दंभ भरती है, पर जिन्हें सचमुच सेवा देने की आवश्यकता होती है, उससे मुह मोड़ लेती है. इन्हें इलाज के लिए कोई सेवा संगठन अस्पताल क्यों नहीं ले जा रहा है? क्या चंद सिक्के उछाल कर इनकी झोली में डाल देने से इनकी स्थिति बदल सकती है?

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