Archive | जनवरी 2012

सफाई और हमारा कर्तव्य

प्रार्थना खत्म होते ही सभी बच्चे लाइन से क्रमवार अपनी-अपनी कक्षा की तरफ चल पड़े.
शिक्षकों ने भी क्लास रूम में जाने की तैयारी शुरू कर दी. वे स्टाफ रूम पहुंचे. अपनी पुस्तकें उठाई और चाक लेकर निकल पड़े.
शर्मा गुरूजी ने अपनी जेब से पान निकाल उसे मुंह में डाल लिया. तभी जायसवाल सर को देखते ही उनकी तरफ पान का एक बीड़ा बढ़ाया. जानते थे वे पान नहीं खायेंगे. घर में बीवी से लड़ाई हो जाएगी. इसलिए घर से बाहर निकलते ही जायसवाल गुरूजी पास के पान ठेले से गुटखा खरीद लेते थे और तंबाकू की तलब को शांत किया करते थे. घर लौटते समय गुडाखू मंजन कर एक इलायची मुंह में दबा घर लौट जाते थे.
जायसवाल और शर्मा मास्टर की क्लास एक दीवार की आड में था. वे दोनों साथ-साथ पुस्तक को बगल में दबाये चलने लगे.
बच्चे कक्षा में पहुंचते ही इतना शोर करने लगे कि गलियारे में ऐसे कोलाहल मचा था मानो मूचाल आ गया हो.
– साले भोसड़ी के अब्बड़ चिल्लाथे टूरा मन. आज छोड़व नहीं. एकाध टूरा सपड़ में आही तो ओकर पेंदा ला लाल करके छोड़ हूं. शर्मा मास्टर बड़बड़ाते हुए दीवार के कोने में पान का पीक फौव्वारे की तरह छोड़ते हुए अपनी क्लास में पहुंचे.
कक्षा में अचानक खामोशी छा गई. मानो कर्फ्यू लग गया हो. जिस बच्चे को जहां जगह मिली वहीं विराजमान हो गये.
शर्मा गुरूजी ने टेबल में पुस्तक को रखने के बाद चॉक उठा ब्लैकबोर्ड में लिखा- सफाई और हमारा कर्तव्य.
बच्चों अब तुम बड़े हो रहे हो. राज्य सरकार भी चाहती है कि तुम अपना और अपने आसपास की जगह को साफ-सुथरा रखो. याद है कुछ दिनों पहले शासन की पहल पर हमने हाथ किस तरह से साफ करना चाहिए, का पाठ पढ़ा था. आज मैं तुमसे इसी से मिलता-जुलता प्रश्न कर रहा हूं कि तुम अपना और अपने आसपास की जगह को साप रखते हो या नहीं. क्या तुम अपने इस कर्तव्य का उचित निर्वहन करते हो?
कुछ बच्चों ने हाथ उपर किये.
– हां राकेश बोलो बेटा.
– मास्टरजी मैं प्रतिदिन अपने हाथों को लक्स साबुन से पूरे 1 मिनट तक रगड़-रगड़ कर साफ करता हूं.
– ठीक, बैठो तुम. बोलो महेश.
– मेरे घर महिने में एक साबुन आता है, उसमें मेरी मां-बाबा, दादी-दादा, मैं मेरी दो बहनें और छोटा भाई सभी थोड़ा-थोड़ा इस्तेमाल करते हैं. उस साबुन में ठीक से झाग भी नहीं आता.
– बच्चों मैं तुम्हें सिर्फ अपने हाथों की सफाई के बारे में नहीं कह रहा हूं. मैं तुम्हें सरल शब्दों में समझाता हूं. तुम्हारा घर जिस गली-मोहल्ले में हैं. वहां की सफाई करना तुम्हारा कर्तव्य है. तुम्हारे आसपास का वातावरण स्वच्छ होना चाहिए. यदि ऐसा नहीं हुआ तो तुम्हें बीमारी घेर लेगी.
– पर मास्टरजी मेरा घर तो गली में नहीं है.
– फिर तुम कहां रहते हो?
– मैं, नाली के ऊपर बने झोपड़ी में रहता हूं. वहां हमेशा नाली के गंदे पानी की बदबू आती रहती है. अब मैं उसका आदि हो गया हूं.
– क्या तुम्हारा घर नहीं है? तुम अपने पिताजी से कहना इंदिरा आवास के लिए आवेदन करे. सरकार गरीबों को इंदिरा आवास मुहैय्या कराती है. फिर भी अभी जहां तुम रहते हो, उसे स्वच्छ रखना चाहिए.
– मास्टरजी उस छोटे से झोपड़े को कैसे साफ रखें. वहीं दादा-दादी बीमार पड़े रहते हैं. मां एक कोने में खाना बनाती है. मेरे बाबा रोज पीकर आते हैं और दरवाजे में ही लुड़क जाते हैं. मैं, मेरा भाई औह बहनें मां के अगल-बगल सिकुड़ कर रात काटते हैं. कहीं खाली जगह नहीं बचती कि उसकी सफाई करें.
– जो भी हो अपने घर और उसके आसपास की जगह को साफ-सुथरा रखना हर नागरिक का प्रथम कर्तव्य होता है.
-योगेश तुम तो झोपड़ी में नहीं रहते. तुम बताओ, तुम सफाई के प्रति कितने सचेत हो?
– मास्टरजी हमारा घर भी छोटा सा है. किराये का मकान है. एक बाड़ा है, जो अब-तब टूटने वाला है. मास्टरजी उसमें 5 परिवार निवास करते हैं. इन सभी के लिए एक पाखाना है. वो भी बहबूदार. उसकी सफाई कोई नहीं करना चाहता. सभी कहते हैं तुम भी तो इस्तेमाल करते हो क्यों साफ नहीं करते? रोज इसी बात को लेकर लड़ाई होती है.
– तुम प्रतिदिन उसकी सफाई कर अपना कर्तव्य निभा सकते हो.
– मैं कर्तव्य तो निभा लूं मास्टरजी, लेकिन ऐसा करने में देरी हो जाएगी. स्कूल समय पर नहीं पहुंचा, तो आप मुर्गा बना देंगे. दोस्त इस बात को लेकर हसी उड़ायेंगे. पास ही रेलवे लाइन है. हम सभी हम उम्र बच्चे वहीं सुबह-सुबह निपट कर आ जाते हैं और स्टेशन के नल में नहा लेते हैं.
पूरी क्लास के बच्चें हसने लगते हैं.
– कोई शोर नहीं मचायेगा. रोहण तुम भी कुछ बोलो.
– मैं?
– हां, मैं तुमसे कह रहा हूं. तुम्हारा घर कहां है?
– हमारा घर गांव में है. मैं अपने भाई के साथ रहता हूं. पिताजी गांव में खेती-किसानी करते हैं. मां भी खेतों में काम करती है. पिताजी चाहते हैं कि हम पढ़ लिख कर साहब बने, तो हमारी गरीबी दूर हो जायेगी.
– तो तुम दोनों भाई कहां रहते हो?
– मैं और मेरा भाई दोनों सफाई के ही काम में लगे रहते हैं. सुबह मैं कम से कम 5 से 6 कमरों की और मेरा भाई भी उतने ही कमरों की सफाई करता है. स्कूल से घर जाने के बाद एक बार फिर इन सभी कमरों की सफाई करते हैं. शाम को आंगन की भी सफाई करनी पड़ती है और बरामदे को धोना पड़ता है.
– शाबाश बेटा. मैं तुम सभी को यही समझा रहा   था कि सफाई और हमारा कर्तव्य क्या है. इसमें रोहण पास हुआ. तुम्हारे इस नेक काम के लिए मैं तुम्हारे पिताजी को धन्य मानता हूं कि उन्होंने तुम दोनों भाईयों को सफाई क्या होती है, अच्छे से समझाया है. जब तुम्हारे पिताजी गांव से तुम्हारे पास मिलने आयेंगे तो उन्हें स्कूल लेकर आना, मैं उनसे मिलना चाहूंगा.
-पर गुरूजी वे रायपुर नहीं आ पायेंगे.
– क्यों, क्या वे हर महिने तुमसे मुलाकात करने नहीं आते?
– कैसे आयेंगे मास्टरजी, आने-जाने में जितना खर्च आयेगा उसे कौन उठायेगा? उतने रूपयों में वे दो दिन भरपेट खाना खा लेंगे. फिर यहां ठहरेंगे कहां?
– जहां तुम दोनों भाई रहते हो?
– गुरूजी वो तो सराय है. वहां इतने काम के बदले हम दोनों भाईयों को रात का खाना और बरामदे में सोने की जगह मिल जाती है. सुबह का खाना स्कूल में मिल जाता है.
शर्मा मास्टर को अब कुछ सुझ नहीं रहा था. उन्हें लगा कि यह पाठ गरीब बच्चों के सरकारी स्कूल में पढ़ाया नहीं जा सकता. ये बच्चे तो इसी लालच में स्कूल आते हैं कि एक समय का भोजन कर लें. मां-बाप भी इन्हें इसलिए स्कूल भेजते हैं कि सूबह का चुल्हा ना जलाना पड़े.
इधर बच्चे एक बार फिर शोर मचाने लगे.

मुफ्त का प्रचार स्थल

पूरे शहर में चाहे कफर््यू क्यों ना लग जाए जय स्तंभ चौक विरान नहीं होता. वहां लगे विज्ञापन और सूचनाएं बोलती रहती हैं. अनेक बार नियम बने कि यहां मुफ्त में विज्ञापन नहीं करने दिया जाएगा, पर लोग हैं कि इससे बेहतर जगह मुफ्त में विज्ञापन करने का मोह छोड़ नहीं पाते. महापौर चिल्लाती रहती हैं, जय स्तंभ को तो बक्श दो. उनकी तो अपने ही नहीं सुनते फिर दुसरे लोग क्यों मौका गवाएं.

दुर्गति

स्टाप लाइन क्रास करने पर अर्थदण्ड 200 रूपये. कुछ इस तरह के बोर्ड रायपुर शहर के प्रत्येक सड़क पर जहां चौक-चौराहा है, देखने को मिल जाएगा. कुछ जगहों में सिग्नल लगाये गये हैं, जहां लिखा रहता है, जेब्रा क्रासिंग पार करने पर अर्थदण्ड. अभी कुछ दिनों पहले ही प्रदेश भर में सुरक्षा सप्ताह मनाया गया है. वाहन चालकों को वाहन चलाने के नियम सहित सुरक्षा के नियमों को बताने बच्चों की मदद ली गई, पर यातायात विभाग इस तरह के आयोजन करने के बाद सुस्त हो जाता है. यह बात लिखने की नहीं तस्वीर खुद बयां कर रहा है.

सहायता नहीं मौत मिली

वनांचल ग्राम गढ़ निवासी मिठी बाई की भित्ति चित्र कला विश्वविख्यात थी. उनके द्वारा बनाई भित्ति चित्र की प्रशंसा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने की थी. मिठी बाई को जब छत्तीसगढ़ राज्य नहीं बना था और यह क्षेत्र मध्य प्रदेश में  आता था, तब 1989-90 में मध्य प्रदेश सरकार ने शिखर सम्मान से नवाजा था. लेकिन ऐसे कलाकारों को जो तिरस्कार मिलता है, वह असहनीय होता है. इस महान हस्ती को अपने इलाज के लिए गरीबी के चलते मौत को गले लगाना पड़ा.
2 साल से वे अस्वस्थ्य थीं. तब मुख्य मंत्री डा. रमन सिंह का कोरबा आगमन हुआ. मिठी बाई के परिजनों ने उनके इलाज के लिए मदद की गुहार लगायी. मुख्य मंत्री ने तब 25 हजार रूपये मदद देने की घोषणा कर दी. रूपये मिलने की आस में मिठी बाई की बेटी कंचन बाई ने कर्ज ले लिया कि मदद की राशि मिलने पर कर्ज चुका देंगी, पर आज की तारीख तक मदद की राशि नहीं मिली और 16 अक्टूबर 2010 को मिठी बाई ने इस संसार को अलविदा कह दिया. एक बार फिर कंचन बाई ने मां के अंतिम संस्कार करने कर्ज लिया और अब वह कर्ज से लद चुकी है. वह घोषणानुसार पिछले 1 साल से कलेक्टोरेट का चक्कर काट रही है. अधिकारी भी कंचन बाई को उलझा कर रख दिये हैं. कभी मृत्यु प्रमाण-पत्र लाने की बात कहते हैं, तो कभी कोई खामी निकाल देते हैं, जबकि घोषणानुसार 25 हजार की राशि उन्हें 2 साल पहले ही दी जानी चाहिए थी.
हमारे प्रदेश के सत्तारूढ़ नेताओं ने कभी कला और कलाकारों (प्रदेश स्तर के) को उचित सम्मान नहीं दिया. छत्तीसगढ़ में अनेक कलाकार हैं, जिन्हें गरीबी की हालत में अपने दिन गुजारने पड़ रहे हैं. नेता सार्वजनिक मंच या लोगों के हुजूम में वाहवाही लूटने आर्थिक सहायता देने की घोषणा कर देते हैं, पर हकीकत इसके ठीक विपरित है. गरीब और अपनी कला में रमे कलाकार और उनका परिवार घोषणा होने पर खुशी से फूला नहीं समाता, लेकिन इस चंद रूपयों को पाने उन्हें कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, इस पीड़ा को वही समझ सकता है, जिस पर बितती है.

ये क्या है?

बच्चे अब हमसे पुछते है, ये क्या है? उन्हें विस्तार से बताना पड़ता है-बेटा इसे लेटर बाक्स कहते हैं. इसमें चिट्ठी डाली जाती है, जो गंतव्य तक पहुंचने में 3 से 5 दिनों का समय लेती है. कभी-कभी महिनों और कई बरस लग जाते हैं.
बच्चा फिर पूछता है-लेटर लिखने की क्या जरूरत है? उनके पास नेट की सुविधा नहीं है क्या? अभी लिखो और तुरंत जवाब हाजिर.
अब इन आज के बच्चों को कैसे समझाए कि जो भाव उस चिट्ठी में होते थे, वो आज के फेसबुक, ट्यूटर आदि में कहां. हमने भी तो अपनों को पत्र लिखना छोड़ दिया है. मोबाइल उठाया बात कर ली. फेसबुक में गये आन लाइट घंटों चटर-पटर कर ली.
बच्चा फिर प्रश्न करता है- इसमें आपकी लिखी चिट्ठी सुरक्षित कैसे रहेगी, बाक्स तो टूटा हुआ है. आपकी लिखी चिट्ठी कोई पढ़ लेगा.
मैंने कहा धबराओ मत इसे कोई नहीं छुएगा. किसी के पास अब पढ़ने का समय नहीं है. देखो इसमें ताला लगा हुआ है. लोग समझदार हैं. ताले में रखी चीजों की तरफ आंख उठा कर नहीं देखते.
पर यह कुछ टूटा-फूटा सा नहीं है?
हां बेटा फास्ट रिलेश्न के जमाने में इसकी दुर्गति होनी थी.

नियम होते हैं तोड़ने के लिए

जोन कमिश्नर नगर निगम रायपुर ने जगह-जगह सफाई व्यवस्था को दुरूस्त रखने दीवारों में सूचना चस्पा किया है कि यहां कचरा फेंकना मना है. उल्लंघन करने वाले पर 1000 रूपया जुर्माना किया जाएगा. इस तरह का कोई नियम हम देखते है, तो खुद को अनपढ़ मान वहीं कचरा फेंक देते हैं. ऐसी जगहों में आवारा पशु मुंह मारते कभी भी देखे जा सकते हैं.

तलाश

छोटे परिवारों में माता-पिता अपने बच्चों की हर ख्वाहिश पूरी करते हैं. उन्हें वह सब खेलने को मिल जाता है, जिसकी वे डिमाण्ड करते हैं, पर एक गरीब का बेटा? वह सड़कों में फैली गंदगी और कचरों के ढेर से अपनी पसंद की चीजें खंगालता है. कुछ मिल गया तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं होता. ये दोनों बच्चे इसी जुगत में हैं कि कुछ तो हाश लगे.