सफाई और हमारा कर्तव्य

प्रार्थना खत्म होते ही सभी बच्चे लाइन से क्रमवार अपनी-अपनी कक्षा की तरफ चल पड़े.
शिक्षकों ने भी क्लास रूम में जाने की तैयारी शुरू कर दी. वे स्टाफ रूम पहुंचे. अपनी पुस्तकें उठाई और चाक लेकर निकल पड़े.
शर्मा गुरूजी ने अपनी जेब से पान निकाल उसे मुंह में डाल लिया. तभी जायसवाल सर को देखते ही उनकी तरफ पान का एक बीड़ा बढ़ाया. जानते थे वे पान नहीं खायेंगे. घर में बीवी से लड़ाई हो जाएगी. इसलिए घर से बाहर निकलते ही जायसवाल गुरूजी पास के पान ठेले से गुटखा खरीद लेते थे और तंबाकू की तलब को शांत किया करते थे. घर लौटते समय गुडाखू मंजन कर एक इलायची मुंह में दबा घर लौट जाते थे.
जायसवाल और शर्मा मास्टर की क्लास एक दीवार की आड में था. वे दोनों साथ-साथ पुस्तक को बगल में दबाये चलने लगे.
बच्चे कक्षा में पहुंचते ही इतना शोर करने लगे कि गलियारे में ऐसे कोलाहल मचा था मानो मूचाल आ गया हो.
– साले भोसड़ी के अब्बड़ चिल्लाथे टूरा मन. आज छोड़व नहीं. एकाध टूरा सपड़ में आही तो ओकर पेंदा ला लाल करके छोड़ हूं. शर्मा मास्टर बड़बड़ाते हुए दीवार के कोने में पान का पीक फौव्वारे की तरह छोड़ते हुए अपनी क्लास में पहुंचे.
कक्षा में अचानक खामोशी छा गई. मानो कर्फ्यू लग गया हो. जिस बच्चे को जहां जगह मिली वहीं विराजमान हो गये.
शर्मा गुरूजी ने टेबल में पुस्तक को रखने के बाद चॉक उठा ब्लैकबोर्ड में लिखा- सफाई और हमारा कर्तव्य.
बच्चों अब तुम बड़े हो रहे हो. राज्य सरकार भी चाहती है कि तुम अपना और अपने आसपास की जगह को साफ-सुथरा रखो. याद है कुछ दिनों पहले शासन की पहल पर हमने हाथ किस तरह से साफ करना चाहिए, का पाठ पढ़ा था. आज मैं तुमसे इसी से मिलता-जुलता प्रश्न कर रहा हूं कि तुम अपना और अपने आसपास की जगह को साप रखते हो या नहीं. क्या तुम अपने इस कर्तव्य का उचित निर्वहन करते हो?
कुछ बच्चों ने हाथ उपर किये.
– हां राकेश बोलो बेटा.
– मास्टरजी मैं प्रतिदिन अपने हाथों को लक्स साबुन से पूरे 1 मिनट तक रगड़-रगड़ कर साफ करता हूं.
– ठीक, बैठो तुम. बोलो महेश.
– मेरे घर महिने में एक साबुन आता है, उसमें मेरी मां-बाबा, दादी-दादा, मैं मेरी दो बहनें और छोटा भाई सभी थोड़ा-थोड़ा इस्तेमाल करते हैं. उस साबुन में ठीक से झाग भी नहीं आता.
– बच्चों मैं तुम्हें सिर्फ अपने हाथों की सफाई के बारे में नहीं कह रहा हूं. मैं तुम्हें सरल शब्दों में समझाता हूं. तुम्हारा घर जिस गली-मोहल्ले में हैं. वहां की सफाई करना तुम्हारा कर्तव्य है. तुम्हारे आसपास का वातावरण स्वच्छ होना चाहिए. यदि ऐसा नहीं हुआ तो तुम्हें बीमारी घेर लेगी.
– पर मास्टरजी मेरा घर तो गली में नहीं है.
– फिर तुम कहां रहते हो?
– मैं, नाली के ऊपर बने झोपड़ी में रहता हूं. वहां हमेशा नाली के गंदे पानी की बदबू आती रहती है. अब मैं उसका आदि हो गया हूं.
– क्या तुम्हारा घर नहीं है? तुम अपने पिताजी से कहना इंदिरा आवास के लिए आवेदन करे. सरकार गरीबों को इंदिरा आवास मुहैय्या कराती है. फिर भी अभी जहां तुम रहते हो, उसे स्वच्छ रखना चाहिए.
– मास्टरजी उस छोटे से झोपड़े को कैसे साफ रखें. वहीं दादा-दादी बीमार पड़े रहते हैं. मां एक कोने में खाना बनाती है. मेरे बाबा रोज पीकर आते हैं और दरवाजे में ही लुड़क जाते हैं. मैं, मेरा भाई औह बहनें मां के अगल-बगल सिकुड़ कर रात काटते हैं. कहीं खाली जगह नहीं बचती कि उसकी सफाई करें.
– जो भी हो अपने घर और उसके आसपास की जगह को साफ-सुथरा रखना हर नागरिक का प्रथम कर्तव्य होता है.
-योगेश तुम तो झोपड़ी में नहीं रहते. तुम बताओ, तुम सफाई के प्रति कितने सचेत हो?
– मास्टरजी हमारा घर भी छोटा सा है. किराये का मकान है. एक बाड़ा है, जो अब-तब टूटने वाला है. मास्टरजी उसमें 5 परिवार निवास करते हैं. इन सभी के लिए एक पाखाना है. वो भी बहबूदार. उसकी सफाई कोई नहीं करना चाहता. सभी कहते हैं तुम भी तो इस्तेमाल करते हो क्यों साफ नहीं करते? रोज इसी बात को लेकर लड़ाई होती है.
– तुम प्रतिदिन उसकी सफाई कर अपना कर्तव्य निभा सकते हो.
– मैं कर्तव्य तो निभा लूं मास्टरजी, लेकिन ऐसा करने में देरी हो जाएगी. स्कूल समय पर नहीं पहुंचा, तो आप मुर्गा बना देंगे. दोस्त इस बात को लेकर हसी उड़ायेंगे. पास ही रेलवे लाइन है. हम सभी हम उम्र बच्चे वहीं सुबह-सुबह निपट कर आ जाते हैं और स्टेशन के नल में नहा लेते हैं.
पूरी क्लास के बच्चें हसने लगते हैं.
– कोई शोर नहीं मचायेगा. रोहण तुम भी कुछ बोलो.
– मैं?
– हां, मैं तुमसे कह रहा हूं. तुम्हारा घर कहां है?
– हमारा घर गांव में है. मैं अपने भाई के साथ रहता हूं. पिताजी गांव में खेती-किसानी करते हैं. मां भी खेतों में काम करती है. पिताजी चाहते हैं कि हम पढ़ लिख कर साहब बने, तो हमारी गरीबी दूर हो जायेगी.
– तो तुम दोनों भाई कहां रहते हो?
– मैं और मेरा भाई दोनों सफाई के ही काम में लगे रहते हैं. सुबह मैं कम से कम 5 से 6 कमरों की और मेरा भाई भी उतने ही कमरों की सफाई करता है. स्कूल से घर जाने के बाद एक बार फिर इन सभी कमरों की सफाई करते हैं. शाम को आंगन की भी सफाई करनी पड़ती है और बरामदे को धोना पड़ता है.
– शाबाश बेटा. मैं तुम सभी को यही समझा रहा   था कि सफाई और हमारा कर्तव्य क्या है. इसमें रोहण पास हुआ. तुम्हारे इस नेक काम के लिए मैं तुम्हारे पिताजी को धन्य मानता हूं कि उन्होंने तुम दोनों भाईयों को सफाई क्या होती है, अच्छे से समझाया है. जब तुम्हारे पिताजी गांव से तुम्हारे पास मिलने आयेंगे तो उन्हें स्कूल लेकर आना, मैं उनसे मिलना चाहूंगा.
-पर गुरूजी वे रायपुर नहीं आ पायेंगे.
– क्यों, क्या वे हर महिने तुमसे मुलाकात करने नहीं आते?
– कैसे आयेंगे मास्टरजी, आने-जाने में जितना खर्च आयेगा उसे कौन उठायेगा? उतने रूपयों में वे दो दिन भरपेट खाना खा लेंगे. फिर यहां ठहरेंगे कहां?
– जहां तुम दोनों भाई रहते हो?
– गुरूजी वो तो सराय है. वहां इतने काम के बदले हम दोनों भाईयों को रात का खाना और बरामदे में सोने की जगह मिल जाती है. सुबह का खाना स्कूल में मिल जाता है.
शर्मा मास्टर को अब कुछ सुझ नहीं रहा था. उन्हें लगा कि यह पाठ गरीब बच्चों के सरकारी स्कूल में पढ़ाया नहीं जा सकता. ये बच्चे तो इसी लालच में स्कूल आते हैं कि एक समय का भोजन कर लें. मां-बाप भी इन्हें इसलिए स्कूल भेजते हैं कि सूबह का चुल्हा ना जलाना पड़े.
इधर बच्चे एक बार फिर शोर मचाने लगे.

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