Archive | फ़रवरी 2012

छत्तीसगढ़ की महिलाओं के होते हैं 36 पति

छत्तीसगढ़ में मेरी पैदाईश है और अब तक जिस बात की मुझे जानकारी नहीं थी वह लेखिका लक्ष्मी शरथ ने हमें बतायी है. उन्होंने एक अंग्रेजी अखबार में लिखे अपने लेख में छत्तीसगढ़ की महिलाओं के 36 पति होने का जिक्र किया है. राज्य की महिलाओं के बारे में अभद्र टिप्पणी से बिफरे राज्य महिला आयोग ने लेखिका और अखबार को कानूनी नोटिस जारी कर तलब करने का फैसला किया है.
सुश्री शरथ पिछले दिनों पर्यटन विभाग के आमंत्रण पर प्रदेश के दौरे पर आई थीं. अपने अनुभव को लिखते हुए शरथ ने प्रदेश की महिलाओं के बारे में उक्त टिप्पणी की. मजे की बात यह है कि इस लेखिका ने सफाई बतौर कहा कि ड्राइवर और गाइड से जो सुना वह लिख दिया. पर्यटक विभाग के प्रमुख जिन्होंने लेखिका लक्ष्मी शरथ को आमंत्रित किया था अब वे यह कह रहे हैं कि हमें उनके आने की कोई जानकारी नहीं है.
जो भी हो क्या बिना किसी पुख्ता जानकारी के इस तरह की टिप्पणी जायज है? ऐसी लेखिका को अब छत्तीसगढ़ की जमी पर पैर नहीं धरने का हमें संकल्प लेना होगा, वरना बाहरी लोग छत्तीसगढ़ की मां, बहन, बेटी और बहुओं के बारे में ना जाने क्या अनाप-शनाप लिख कर हमारे बारे में भ्रम फैलाती रहें. कुछ महिला संस्थानों की महिलाओं ने इसके विरोध स्वरूप लेखिका लक्ष्मी शरथ का पुतला दहन भी किया है.

जाएं तो जाएं कहां

गर्मी में सफर करना त्रासदायी होता है, उस पर भारतीय रेल कभी भी समय पर चलती नहीं. कुछ प्लेटफार्म में कुर्सियां जरूर लगी होती हैं पर उसमें पहले से लोग विराजमान रहते हैं ऐसे में हाथ-पांव पसारने और एक छपकी लेने के लिए लोग जगह बना ही लेते हैं.

थोड़ा सुस्ता लें

गर्मी आते ही घर से बाहर निकलना मुहाल हो जाता है. कुछ काम ऐसे होते हैं, जिसे करने के लिए घर से बाहर कदम उठाना ही पड़ता है. साथ में छोटा बच्चा हो तो उसकी हिफाजत करना भी जरूरी हो जाता है. पूरे जतन के साथ अर्थात लू से बचने सिर को ढकने के जुगाड़ सहित पीने के लिए पानी रखने के बावजूद गर्मी थका देता है. एक जगह स्टाप लिखा देख दो महिलाएं और एक पुरूष बच्चे की बेचैनी को समझ थोड़ा सुस्ताने की जगह ढूंढ ही लिए.

भैंसों की कैटवॉक

आपने मॉडल्स की कैटवॉक के बारे में तो सुना होगा लेकिन क्या आपने ऐसी किसी कैटवॉक के बारे में सुना है जहां मवेशी रैंप पर चलनेवाले हों?
हरियाणा राज्य में ऐसी कैटवॉक होने वाली है जिसमें 30 भैंसों को रैंप पर चलाया जाएगा.अधिकारियों का कहना है कि भैंसों की कैटवॉक के लिए अलग तरह की डिजाइन वाली रैंप बनाई जा रही है. इस कैटवॉक का मकसद भैंसों की एक खास नस्ल और यादा दूध देने की क्षमता के बारे में लोगों को जागरुक करना है. भैंसों की ये ख़ास नस्ल मुर्रा कहलाती है और उनकी मांगज्यादा है. मुर्रा भैंसों की ये स्पेशल कैटवॉक हरियाणा के जींद शहर में 22 फरवरी को होनेवाली है. कैटवॉक से एक दिन पहले रिहर्सल के लिए 70 भैंसों को बुलाया गया है. कैटवॉक के दौरान भैंसों का सम्मान करने के लिए उनपर फूल बरसाए जाएंगे. इस आयोजन का उद्घाटन कृषि मंत्री शरद पवार करेंगे.

चलो राजिम कुंभ

स्वर्गीया इंदिरा गांधी की मूर्ति के चारों ओर बने घेरे में इन दिनों राजिम कुंभ जाने तोरण लगा दिया गया है. इस कुंभ का भगवा करण कर दिया गया है. यहां लगा तोरण इसकी गवाही दे रहा है. एक तरफ हमें नियम-कायदों की घुट्टी पिलायी जाती है तो दूसरी तरफ चौक-चौराहों का इस तरह विज्ञापन कर हमें सोचने मजबूर कर देता है कि हम ऐसा करें तो गलत वे करें तो सब सही.

साथी हाथ बढ़ाना

गांव में आज भी कई यात्रियों के आने की राह बस चालक देखते हैं. उन्हें बता दिया जाता है कि  फलाना दाउ आज बस में बइठ के जाही. कुछ इसी तरह का नजारा यहां रेल सफर के दौरान देखने को मिल रहा है. एक यात्री बड़े इतमिनान के साथ रेल डिब्बे में चढ़ने की तैयारी कर रहा है, जिसे हाथ बढ़ा कर डिब्बे के अंदर लेने की जुगत में एक युवक लगा है, तो दूसरे डिब्बे में लपक कर कुछ लोग चढ़ रहे हैं. एक युवक तो इतना मस्त है कि बाहर लटक कर सफर करने में जान का खतरा समझ ही नहीं रहा है.
———–

मंदिर में चप्पल पहनकर क्यों नहीं जाते हैं?

आपको पता है, मंदिर में चप्पल पहनकर क्यों नहीं जाते हैं? हमारे यहां हर धर्म के देवस्थलों पर नंगे पांव प्रवेश करने का रिवाज है. मंदिरों में नंगे पैर प्रवेश करने के पीछे कई कारण हैं. देवस्थानों का निर्माण कुछ इस प्रकार से किया जाता है कि उस स्थान पर काफी सकारात्मक ऊर्जा एकत्रित होती रहती है. नंगे पैर जाने से वह ऊर्जा पैरों के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश कर जाती है, जो कि हमारे स्वास्थ्य के लिए भी बहुत लाभदायक रहती है. नंगे पैर चलना एक्यूप्रेशर थैरेपी ही है और एक्यूप्रेशर के फायदे सभी जानते हैं लेकिन आजकल अधिकांश लोग घर में भी हर समय चप्पल पहनें रहते हैं इसीलिए हम देवस्थानों में जाने से पूर्व कुछ देर ही सही पर जूते-चप्पल रूपी भौतिक सुविधा का त्याग करते हैं. इस त्याग को तपस्या के रूप में भी देखा जाता है. जूते-चप्पल में लगी गंदगी से मंदिर की पवित्रता भंग ना हो, इस वजह से हम उन्हें बाहर ही उतारकर देवस्थानों में नंगे पैर जाते हैं.