अद्श्य

फिर से जुड़ने की आस में
भटक रही हूं गली-गली
तुम न सहज होते हो
न होने देते हो.
तुम्हारी दस वर्षीय योजना में
मकान है, ऐशो-आराम है,
खान-पान है, दुनियादारी है
अद्श्य है तो वह मैं.
अहसास दिलाती हूं मैं
तुम्हारे आस-पास हूं
पर तुम उसे सुनकर
अनसुनी कर देते हो.
तुम्हे अपनी शारीरिक थकावट
अपना काम और अर्थ लाभ
याद रहता है
खो जाती हूं तो वह मैं.
0 शशि परगनिहा

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