संभवत:

आप इसे नहीं स्वीकारेंगे
कि इस खाली घर में,
यहां की चारदीवारी में.
मैं पल-पल टूटती-बिखरती हूं.
बार-बार एक सूत्र में,
आप संग बिताये छणों को,
गुथती-पिरोती हूं.
संभवत:
आप इसे मानने से इंकार करें,
कि इस खामोश घर में,
भीगी आंखों में बंद,
अश्रुजल को
सहेज कर रखी हूं.
अपने मन-प्रआण में,
आपको बेतहाशा चाहते हुए.
0 शशि परगनिहा

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: