Archive | फ़रवरी 2013

बोलती बंद

बोलती बंद
-अरे शशि तू यहां बैठी है?
-आॅफिस में और कहां बैठूंगी, यही मेरी सीट है.
-एक समाचार छपाना है. मेरे बैंक का है.
-मेरा इसमें कोई रोल नहीं है. ये समाचार वाणिज्य पेज में जाएगा. इसे जो देखते हैं, उन्हीं की सीट में तुम बैठे हो.
-तुम मैनेज कर लेना.
-नहीं में इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती. सभी के विभाग बटे हुए हैं. हां मैं तुम्हारी तरफ से निवेदन कर दूंगी कि छाप दो.
-फिर छप ही जाएगा.
-और क्या हाल है?
बातों का सिलसिला चल निकला. अब तक मैं उसे पहचान नहीं पायी थी, पर जब पुरानी बांते खुलने लगी तो याद आ गया कि हमने साथ में पत्रकारिता की है. अब वह 2 बच्चों का पिता है और बैंक में मैनेजर की प्रमोशन पर बस्तर में कार्यरत है.
इस दोस्त का जिक्र इसलिए कि जब हम साथ पढ़ाई कर रहे थे, तो नोट्य का आदान-प्रदान किया करते थे. रात में हमारी क्लास लगती थी और कई ऐसे सहपाठी भी थे, जो अपने नाम के साथ एक और डिग्री जोड़ कर अपने नाम की लाइन को लंबी करना चाहते थे. कुछ हम उम्र थे, तो अनेक शादी-शुदा और नौकरीपेशा भी. रात में कालेज चलने से लड़की होने की वजह से सप्ताह में एक-दो दिन कालेज जाते नहीं थे, पर यह बंदा हर दिन क्लास अटेण्ड करता था इसलिए नोट्स की जरूरत पड़ जाती थी और बातचीत भी होती थी.
एक दिन न जाने वह मेरे घर नोट्स लेकर पहुंच गया. मैंने सहजता से उसे बैठने कहा. वह बैठा भी और नोट्स देकर 5 मिनट में लौट गया लेकिन इसके बाद मेरे भाई ने जो हंगामा किया उसकी मुझे कल्पना नहीं थी. मेरे हाथ से नोट्स छिन कर भाई ने उसके एक-एक पन्ने को खंगाल लिया. उसे कहीं कोी लव लेटर या आपत्तिजनक टिप्पणी नहीं मिली, पर अपने कृत्य को सहीं साबित करने घर सिर पर उठा लिया. मां पहले आयी फिर पिताजी. माजरा क्या है जानने की कोशिश हुई. तर्क-वितर्क होते रहे लेकिन मैंने अपने भाई के एक प्रश्न कि-वह आखिर कौन है और यहां तक कैसे आया? तेरा उसके साथ रिश्ता क्या है?
मैंने सहजता से सिर्फ इतना कहा-तुम खून के रिश्ते से मेरे भाई हो और वह सहपाठी है, तुम्हारी तरह वह भी मेरे भाई की तरह है.
घंटे भर चले उत्तेजित माहौल में अचानक शांति छा गई. मां चौके में चली गई. पिताजी अपने कमरे में और भाई निरूत्तर हो सिर के बाल खुजाने लगा.
शशि परगनिहा
28 फरवरी 2013, गुरूवार
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कोलकाता हादसा

कागज की चादर ओढ़
खामोश हो गये
गहरी नींद में
कि उस रात का कभी सवेरा न हुआ….
शशि परगनिहा
28 फरवरी 2013, गुरूवार
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अधेड़ पुरूष की चाहत

अधेड़ पुरूष की चाहत
जिन्दगी कितनी अजीब है और लोगों की जरूरतें भी. मेरा अभी कुछ दिनों पहले एक सेवानिवृत्त अधिकारी से पाला पड़ा, जो नौकरी करते तक अविवाहित रहे. उम्र अनुसार परिजनों-मित्रों ने उन्हें शादी कर लेने की सलाह दी पर वे इस वर्ष नहीं यही रट लगाते रहे अ‍ैर वह दिन आया जब लोगों ने उनसे विवाह कर लेने की समझाइश देनी बंद कर दी.
नौकरी में ऐसे रमे कि आसपास से बेखबर हो गये. नियमित दिनचर्या रिटायर होते ही बदल गयी. अब समय ही समय … और कोई काम नहीं. परिवार से दूर रहने के कारण वो अत्मीयता नहीं रही कि अब उनसे जुड़ने की कोशिश करें तो उनके अपने उन्हें सहजता से लें.
बातों-बातों में उन्होंने शादी की ख्वाहिश जाहिर कर दी. किसी लड़की के बारे में पूछने लगे. मैंने कहा अब आप अपने परिवार की किसी कन्या को अभिभावक की तरह पालें, उसकी अच्छी परवरिश करें ताकि वह शिक्षित हो अपने पैरों पर खड़ी हो सके. मेरी बात को सिरे से काटते हुए उन्होंने कहा-मेरी लाखों-करोड़ों की सम्पति का क्या होगा? मुझे वारिश चाहिए?
बात लंबी चली पर सार यही रहा कि उन्हें इस उम्र में ऐसी सुघड़ महिला-युवती चाहिए, जो उनके खान-पान, समय पर दवाई अ‍ैर जरूरत पड़ी तो हाथ-पैर दबा सके अ‍ैर एक पुत्र वारिश भी तो चाहिए. कुल जमा..एक नौकरानी, जो समाज की नजरों में पत्नी कहलाए अ‍ैर उनकी यौन इच्छाओं की पूर्ति कर सके.
इन दिनों में खुशवंत सिंह का उपन्यास औरतें पढ़ रही हूं, जिसमें उपन्यासकार ने मुख्य पात्र मोहन की अपनी पत्नी से तलाक के बाद की स्थिति खास जो सेक्स की तलाश में भटक रहा है, का यथार्थ चित्रण किया है. उन्होंने स्पष्ट लकीर खींची है कि आदमी जब वृध्द होने लगता है, उसकी कामेच्छा शरीर-मध्य से उठकर दिमाग की ओर बढ़ने लगता है. अपनी जवानी में वह जो करना चाहता था अ‍ैर अवसर के अभाव, घबराहट या दूसरों की स्वीकृति न मिलने के कारण नहीं कर सका, उसे वह अपने कल्पनालोक में करने लगता है.
इस उपन्यास का जिक्र इसलिए  कि औरतें पढ़ते-पढ़ते मुझे उस रिटायर अधिकारी की याद ताजा हो गयी. कितना आसार है एक पुरूष के लिए जिसकी चाह होती है एक ऐसी स्त्री की, जो हमेशा उसकी हमराह हो, उसके साथ हम-बिस्तर भी हो सके, पर उसकी स्वतंत्रता में कभी दखल ना दे. वह घर में नौकरानी की तरह काम करती रहे…अपनी जरूरतें न बताये…खामोश उसकी आज्ञा का पालन करे और उसकी सेक्स की पूर्ति के लिए हर वक्त तैयार रहे.
शशि परगनिहा
27 फरवरी 2013, बुधवार
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क्षमा बडन को चाहिए छोटन को…

क्षमा बडन को चाहिए छोटन को….
एक ब्राह्मण, एक योध्दा, एक व्यापारी, एक कलाकार-इन चारों का मूल मानवीय चरित्र एक सा होता है. ये सभी जन्म और मृत्यु के समय असहाय होते हैं. इन सभी में प्रेम और क्रोध जैसे भावावेग रहते हैं, पर ब्राह्मण के व्यक्तित्व को नियंत्रित करती है-शास्त्र नीति, योध्दा के  व्यक्तित्व को रणनीति, व्यापारी के  व्यक्तित्व को व्यापार नीति और कलाकार के  व्यक्तित्व को कला प्रवणता. वैसे ही राजपुरूष के  व्यक्तित्व की मुख्य दिशा है राजनीति. किसमें उसका स्वार्थ है और किसमें उसके स्वार्थ का विरोध है इसका निरूपण राजनीति के मापदंड ही करते हैं.
कुछ ऐसी ही नीति को अपना अस्त्र बना छत्तीसगढ़ प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने एक जाति विशेष के खिलाफ तीर कमान से निकाल दी है, पर दूसरी ओर भी भेदी तीर को रोकने की क्षमता है. ये ऐसी चोट है, जो शरीर को भेद नहीं पायी, पर मन-मस्तिष्क को लहु-लुहान कर गयी. क्रिया पर प्रतिक्रिया का दौर चल रहा है. मामला थाने में पहुंच गया है.
छत्तीसगढ़ में कुर्मी समाज के लोगों की संख्या नगण्य नहीं है कि आप भरी सभा में अंबुजा सीमेंट संयंत्र के खिलाफ आयोजित धरना-प्रदर्शन में विवादास्पद टिप्पणी कर खामोश हो जाए और हमारे शरीर में संचालित रक्त पानी हो जाए. हमारी खामोशी और उव्देलित नहीं होने को हमारी कमजोरी न समझे. हम तब प्रहार करते हैं, जब आप मदमस्त हो आपा खो बैठते हैं. हम तो इस इंतजार में थे कि विधानसभा में कितने दम-खम के साथ मामला उठाया जाता है और न्याय दिलाने की कोशिश होती है. वहां तो हवा गुल हो गयी. मामला जरूर उठा लेकिन किसी ने वाक आउट नहीं किया. मतलब तो यही निकलता है कि जिसे हमने अपना प्रतिनिधि चुना वह बौना है.
अंबुजा में हुए हादसे पर मैंने पहले ही अपने विचार रख दिये हैं. मैंने इस पर तीखी टिप्पणी की थी, पर क्या हुआ? क्या विधानसभा में किसी नेता ने अपनों की शहादत पर सत्ता पक्ष के नेताओं को झकझोरा, नहीं ना. फिर इस मुद्दे को अंबुजा संयंत्र में धरना प्रदर्शन व सभा लेकर क्या जाहिर करना चाहते हैं? क्या ऐसा कर हम उन मृतकों को श्रध्दांजलि दे रहे हैं? या उस लहू के छिंटों से खुद की बगीया सींच रहे हैं?
हम छत्तीसगढ़िया, हम कुर्मी. हमें नाज है कि हम अपनी पहचान कायम रखे हैं. हमें खुद पर फक्र है कि हम अपने मेहमान को सिर-आखों में बिठा कर रखते हैं. हममें सहनशीलता है, धैर्य है. हम उजबक नहीं हैं कि जब-तब किसी का हाथ-पैर तोड़ें, हाथा-पायी करें, लोगों पर डंडे बरसायें.
मुझसे एक बार किसी ने कहा था- छत्तीसगढ़िया प्रगति नहीं कर सकते. वे हम जैसे बाहरी लोगों को अपने उपर बिठाते और उनकी जी-हुजूरी करते हैं. इन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ना नहीं आता. शायद उन्हें नहीं मालूम था कि जिससे वे यह बात कह रहे हैं, वह इसी माटी में जन्मी है. आज वही बंदा अपनी उस कुर्सी और केबिन में बंद है. वह किसी से बात करने में घबराता है कि न जाने ये छत्तीसगढ़िया क्या बात सहजता से कह दे कि दो-चार रातों की नींद हराम हो जाए.
पूर्व मुख्यमंत्री सयाने हैं. वे हमें भड़काना चाहते हैं और इसी बहाने सुर्खिया बटोरने में लगे हैं. हमें अपने मूल व्यवहार में परिवर्तन नहीं लाना है. हां पर हमारी नीति यह है कि तब प्रहार करें, जब लोहा गर्म हो. वे हमें भड़काने की बजाए अपनी राजनीतिक चाल से पीड़ित और दुखी परिवार को राहत दिलायें. सुर्खियां बटोरना हमें भी आता है, लेकिन हमारी फितरत मेहनत कर प्रगति करने की है. हम सीढ़ी-दरसीढ़ी चलते हैं. उछल कर शिखर को नहीं छूते. एक काम में जरूर हमें लग जाना है, जिस सार्वजनिक स्थल से उन्होंने विवादास्पद टिप्पणी की है वैसे ही मंच से हमारी जाति विशेष से क्षमा के लिए हाथ जोड़ दें.
क्योंकि- क्षमा बड़न को चाहिए,
छोटन को……………
शशि परगनिहा
25 फरवरी 2013, सोमवार
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स्वतंत्रता का अहसास

स्वतंत्रता का अहसास
कार पोर्च से बाहर निकाली. कार का दरवाजा खुला. चंद सेकेण्ड बाद बंद हुआ. गाड़ी स्टार्ट हुई और…. घर में अचानक तेज म्यूजिक बजने लगा कि कुछ क्षण के लिए मुझे कुछ समझ नहीं आया. काई पो चे फिल्म के गाने के साथ मोटी-मोटी सी सामुहिक स्वर भी उस गाने के साथ मधुरता को कर्कश कर रहे थे. दरअसल ये सभी अभी-अभी बचपने से युवा होने की दहलीज में कदम रख रहे हैं और इन्हीं दिनों इनकी आवाज में परिवर्तन आने लगता है, तब ये ना मर्द की श्रेणी में होते हैं और न बच्चे रह जाते हैं. मैं अपने घर में लिखने बैठी थी, पर इस तेज गीत और कर्कश ध्वनि ने मेरी तन्द्रा भंग कर दी. अचानक यह शोर कैसा जानने घर से बाहर आंगन में कदम रखी तो समझ में आया, पड़ोसी की कार उनके पोर्च से गायब है. याने जब तब मम्मी-पापा बाहर उनके घर में उनके दो बच्चों का साम्राज्य. तभी एक बच्चा दरवाजा खोल बाहर निकला. इधर-उधर ताकाझाकी की और दरवाजा बंद कर सुर में सुर मिलाने लगा.
मैं असहास सी कुछ भी करने लायक नहीं. सोचा नहा लिया जाए. नौकरी भी तो करनी है. तैयार हुई और जैसे ही डयूटी जाने घर से बाहर निकली पड़ोसी के घर में सन्नाटा. तभी पड़ोसी की कार उनके गेट के सामने रूकी. सब कुछ पहले की तरह. कहीं जैसे कुछ हुआ ही नहीं. बच्चों के दोस्त अपने-अपने घरों में. कुल 1 घंटे का धमाल.
आखिर ऐसा क्यो? क्या ये बच्चे अपने माता-पिता से भयभीत हैं? या इन्हें उनकी अनुपस्थिति अपनी स्वतंत्रता का अहसास दिलाते हैं? क्यों हमारे बच्चे हमारी उपस्थिति में हंगामा नहीं करते? क्यों हमारे और उनके बीच एक आवरण चढ़ा हुआ है? क्यों वे हमसे अपनी खुशी और दिनभर की कारगुजारियों को सांझा नहीं करते? क्यों हम उन्हें इतनी आजादी नहीं देते कि वे अपनी खुशी को घर में खुल कर व्यक्त कर सकें? क्यों वे इस इंतजार में रहते हैं कि हमारी गैर हाजरी में अपने दोस्तों के बीच शोर मचायें?
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महिलाओं के हाथ खाली

महिलाओं के हाथ खाली
आधी आबादी की ताकत को कमजोर करने अप्रत्यक्ष रूप से राज्य सरकार ने अपना काम कर दिया है. छत्तीसगढ़ के बजट में महिलाएं खाली हाथ है. उनके लिए ऐसी कोई लाभ की योजना नहीं है, जिससे वे खुश हो सके. महिला व बाल विकास और समाज कल्याण विभाग को मिला दें, तो उस मद में (1) 1533 आंगनबाड़ी भवन बनाने
(2)  6 माह से तीन साल के बच्चों की देखरेख, पका भोजन देने पंचायतों में फुलवारी केन्द्र और
(3) महिला स्वसहायता समूहों को तीन फीसदी में कर्ज. ये तीन घोषणाएं हुई है, जिसका लाभ ग्रामीण क्षेत्रों में ही मिल पायेगा. शहरी क्षेत्र की महिलाओं के लिए आखिल है क्या? लगता है यह वर्ग सरकार की प्राथमिकता में नहीं है. वर्तमान में महिलाओं के साथ हो रहे दुव्यवहार की भी अनदेखी कर दी गई है. इस बजट में महिलाओं के संरक्षण, विकास और सशक्तिकरण की कोई योजना नहीं है.
बजट को लुभावना कहा जा रहा है. लग भी रहा है, पर सभी विभागों का सुक्ष्म अध्ययन किया जाए, तो आप ठगे से रह जायेंगे, क्योंकि महिलाओं के बाद बच्चे फिर युवा और बुजुर्गों के लिए बजट में आखिर है क्या? क्या बुजुर्गो को तीर्थ यात्रा करा देना और मुफ्त में साड़ियों का वितरण कर अगले चुनाव की वैतरणी पार लगायी जा सकती है? फिर बजट की राशि सभी विभागों में आने और उसके तुरंत बाद चुनाव आचार संहिता लगने पश्चात न जाने कौन सी पार्टी फतह हासिल कर लें.
चलते-चलते
वरिष्ठ पत्रकारों के लिए सम्मान निधि योजना एवं सभी पत्रकारों के लिए बीमा योजना की घोषणा हुई है. मेरे पत्रकार साथी जरा पता कर लें कि ये पत्रकार कहीं एग्रीडियेटेड की श्रेणी में तो नहीं आते यदि ऐसा है तो आपको इन सुविधाओं से वंचित रहना होगा, क्योंकि इस क्रम में कुछ ही पत्रकार शामिल हैं.
शशि परगनिहा
24 फरवरी 2013, रविवार
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नींद आयी और हमने तान ली चादर…….

नींद आयी और हमने तान ली चादर…….
– अरे क्या हुआ, ये सिर ढक कर कैसे सो रही है?
– भरी गर्मी में चादर तान कर पसीने से तर-ब-तर गहरी नींद में कैसे?
भारत में 99 प्रतिशत नवयौवना और युवतियां (कुछ शादीशुदा महिलाएं भी) हर मौसम में सोते समय चादर से अपने शरीर को ढक लेती हैं. बहुत गर्मी लगी तो पैर का कुछ हिस्सा चादर से हटा लेती हैं, पर गले तक चादर किसी सुरक्षा कवच की तरह उनके शरीर से लिपटा रहता है. उनके सोने की शैली जो भी हो चाहे दाएं करवट ले या बाएं या सीधे चीत लेटे या पेट के बल सुरक्षा का आवरण तब भी दामन नहीं छोड़ता.
ऐसे ही कुछ युवतियों और महिलाओं को सिर से लेकर पैर तक ( किसी मुर्दे को कफन ओढ़ाने की मुद्रा में ) चादर तानने की आदत होती है.
यह आदत किसी युवक या पुरूष में क्यों नहीं? हां कुछ लोगों को जरूर ऐसी आदत हो, पर यह संख्या नगण्य है.
यहां बात अविवाहित युवतियों की हो रही है, तो प्रश्न उठता है कि जहां वह अपनों के संरक्षण में नवजात से नवयौवन में कदम रखी फिर किससे भय? जो उसे कवच की तरह चादर की जरूरत पड़ जाती है? क्या अपने ही लोगों से भय है? आखिर यह आदत उसे अपनी मां, दादी, बड़ी मम्मी, नानी, बुआ से कभी मिली है? क्या उसने अपनी बड़ी बहन, बुआ से यह आदत सीखी है या जब से वह पैदा हुई है, उसे बड़े स्नेह से मां ने इसी तरह ढक-तोप कर रखा है, जो समय के साथ-साथ उसका साथी बन गया.
कफन की तरह चादर ढकने के पीछे की वजह शायद यह हो कि मच्छरों के प्रहार से खुद को बचाना हो, क्योंकि मच्छर भगाने की क्रीम शरीर में मल लो या क्वाइल जलाओ या आॅल आउट का उपयोग करो सारे जतन धरे के धरे रह जाते हैं और मौका मिलते ही किसी प्रेमी की तरह ऐसी चुम्मी लेता है कि उसके जाने के बाद आप किसी प्रेमिका की तरह उसकी यादों में न चाहते हुए भी उस जगह अपने नरम हाथों से सहलाते रहते हैं.
मैंने इस अनुभव को सहजता से रेखांकित किया है, पर जिन्हें अलग-अलग विषयों में शोध करने में रूचि हो वे जरूर इसमें युवतियों की राय लेकर निष्कर्ष निकालें कि आखिर इसका राज क्या है?
शशि परगनिहा
22 फरवरी 2013, शुक्रवार
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