नींद आयी और हमने तान ली चादर…….

नींद आयी और हमने तान ली चादर…….
– अरे क्या हुआ, ये सिर ढक कर कैसे सो रही है?
– भरी गर्मी में चादर तान कर पसीने से तर-ब-तर गहरी नींद में कैसे?
भारत में 99 प्रतिशत नवयौवना और युवतियां (कुछ शादीशुदा महिलाएं भी) हर मौसम में सोते समय चादर से अपने शरीर को ढक लेती हैं. बहुत गर्मी लगी तो पैर का कुछ हिस्सा चादर से हटा लेती हैं, पर गले तक चादर किसी सुरक्षा कवच की तरह उनके शरीर से लिपटा रहता है. उनके सोने की शैली जो भी हो चाहे दाएं करवट ले या बाएं या सीधे चीत लेटे या पेट के बल सुरक्षा का आवरण तब भी दामन नहीं छोड़ता.
ऐसे ही कुछ युवतियों और महिलाओं को सिर से लेकर पैर तक ( किसी मुर्दे को कफन ओढ़ाने की मुद्रा में ) चादर तानने की आदत होती है.
यह आदत किसी युवक या पुरूष में क्यों नहीं? हां कुछ लोगों को जरूर ऐसी आदत हो, पर यह संख्या नगण्य है.
यहां बात अविवाहित युवतियों की हो रही है, तो प्रश्न उठता है कि जहां वह अपनों के संरक्षण में नवजात से नवयौवन में कदम रखी फिर किससे भय? जो उसे कवच की तरह चादर की जरूरत पड़ जाती है? क्या अपने ही लोगों से भय है? आखिर यह आदत उसे अपनी मां, दादी, बड़ी मम्मी, नानी, बुआ से कभी मिली है? क्या उसने अपनी बड़ी बहन, बुआ से यह आदत सीखी है या जब से वह पैदा हुई है, उसे बड़े स्नेह से मां ने इसी तरह ढक-तोप कर रखा है, जो समय के साथ-साथ उसका साथी बन गया.
कफन की तरह चादर ढकने के पीछे की वजह शायद यह हो कि मच्छरों के प्रहार से खुद को बचाना हो, क्योंकि मच्छर भगाने की क्रीम शरीर में मल लो या क्वाइल जलाओ या आॅल आउट का उपयोग करो सारे जतन धरे के धरे रह जाते हैं और मौका मिलते ही किसी प्रेमी की तरह ऐसी चुम्मी लेता है कि उसके जाने के बाद आप किसी प्रेमिका की तरह उसकी यादों में न चाहते हुए भी उस जगह अपने नरम हाथों से सहलाते रहते हैं.
मैंने इस अनुभव को सहजता से रेखांकित किया है, पर जिन्हें अलग-अलग विषयों में शोध करने में रूचि हो वे जरूर इसमें युवतियों की राय लेकर निष्कर्ष निकालें कि आखिर इसका राज क्या है?
शशि परगनिहा
22 फरवरी 2013, शुक्रवार
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