महिलाओं के हाथ खाली

महिलाओं के हाथ खाली
आधी आबादी की ताकत को कमजोर करने अप्रत्यक्ष रूप से राज्य सरकार ने अपना काम कर दिया है. छत्तीसगढ़ के बजट में महिलाएं खाली हाथ है. उनके लिए ऐसी कोई लाभ की योजना नहीं है, जिससे वे खुश हो सके. महिला व बाल विकास और समाज कल्याण विभाग को मिला दें, तो उस मद में (1) 1533 आंगनबाड़ी भवन बनाने
(2)  6 माह से तीन साल के बच्चों की देखरेख, पका भोजन देने पंचायतों में फुलवारी केन्द्र और
(3) महिला स्वसहायता समूहों को तीन फीसदी में कर्ज. ये तीन घोषणाएं हुई है, जिसका लाभ ग्रामीण क्षेत्रों में ही मिल पायेगा. शहरी क्षेत्र की महिलाओं के लिए आखिल है क्या? लगता है यह वर्ग सरकार की प्राथमिकता में नहीं है. वर्तमान में महिलाओं के साथ हो रहे दुव्यवहार की भी अनदेखी कर दी गई है. इस बजट में महिलाओं के संरक्षण, विकास और सशक्तिकरण की कोई योजना नहीं है.
बजट को लुभावना कहा जा रहा है. लग भी रहा है, पर सभी विभागों का सुक्ष्म अध्ययन किया जाए, तो आप ठगे से रह जायेंगे, क्योंकि महिलाओं के बाद बच्चे फिर युवा और बुजुर्गों के लिए बजट में आखिर है क्या? क्या बुजुर्गो को तीर्थ यात्रा करा देना और मुफ्त में साड़ियों का वितरण कर अगले चुनाव की वैतरणी पार लगायी जा सकती है? फिर बजट की राशि सभी विभागों में आने और उसके तुरंत बाद चुनाव आचार संहिता लगने पश्चात न जाने कौन सी पार्टी फतह हासिल कर लें.
चलते-चलते
वरिष्ठ पत्रकारों के लिए सम्मान निधि योजना एवं सभी पत्रकारों के लिए बीमा योजना की घोषणा हुई है. मेरे पत्रकार साथी जरा पता कर लें कि ये पत्रकार कहीं एग्रीडियेटेड की श्रेणी में तो नहीं आते यदि ऐसा है तो आपको इन सुविधाओं से वंचित रहना होगा, क्योंकि इस क्रम में कुछ ही पत्रकार शामिल हैं.
शशि परगनिहा
24 फरवरी 2013, रविवार
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