स्वतंत्रता का अहसास

स्वतंत्रता का अहसास
कार पोर्च से बाहर निकाली. कार का दरवाजा खुला. चंद सेकेण्ड बाद बंद हुआ. गाड़ी स्टार्ट हुई और…. घर में अचानक तेज म्यूजिक बजने लगा कि कुछ क्षण के लिए मुझे कुछ समझ नहीं आया. काई पो चे फिल्म के गाने के साथ मोटी-मोटी सी सामुहिक स्वर भी उस गाने के साथ मधुरता को कर्कश कर रहे थे. दरअसल ये सभी अभी-अभी बचपने से युवा होने की दहलीज में कदम रख रहे हैं और इन्हीं दिनों इनकी आवाज में परिवर्तन आने लगता है, तब ये ना मर्द की श्रेणी में होते हैं और न बच्चे रह जाते हैं. मैं अपने घर में लिखने बैठी थी, पर इस तेज गीत और कर्कश ध्वनि ने मेरी तन्द्रा भंग कर दी. अचानक यह शोर कैसा जानने घर से बाहर आंगन में कदम रखी तो समझ में आया, पड़ोसी की कार उनके पोर्च से गायब है. याने जब तब मम्मी-पापा बाहर उनके घर में उनके दो बच्चों का साम्राज्य. तभी एक बच्चा दरवाजा खोल बाहर निकला. इधर-उधर ताकाझाकी की और दरवाजा बंद कर सुर में सुर मिलाने लगा.
मैं असहास सी कुछ भी करने लायक नहीं. सोचा नहा लिया जाए. नौकरी भी तो करनी है. तैयार हुई और जैसे ही डयूटी जाने घर से बाहर निकली पड़ोसी के घर में सन्नाटा. तभी पड़ोसी की कार उनके गेट के सामने रूकी. सब कुछ पहले की तरह. कहीं जैसे कुछ हुआ ही नहीं. बच्चों के दोस्त अपने-अपने घरों में. कुल 1 घंटे का धमाल.
आखिर ऐसा क्यो? क्या ये बच्चे अपने माता-पिता से भयभीत हैं? या इन्हें उनकी अनुपस्थिति अपनी स्वतंत्रता का अहसास दिलाते हैं? क्यों हमारे बच्चे हमारी उपस्थिति में हंगामा नहीं करते? क्यों हमारे और उनके बीच एक आवरण चढ़ा हुआ है? क्यों वे हमसे अपनी खुशी और दिनभर की कारगुजारियों को सांझा नहीं करते? क्यों हम उन्हें इतनी आजादी नहीं देते कि वे अपनी खुशी को घर में खुल कर व्यक्त कर सकें? क्यों वे इस इंतजार में रहते हैं कि हमारी गैर हाजरी में अपने दोस्तों के बीच शोर मचायें?
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