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टाजन फिल्म का चिंपाजी

1930 के दशक में हॉलीवुड में टार्जन फिल्म में दिखाई दिया चिंपाजी की 80 साल की उम्र में मौत हो गई है. इस चिंपाजी की मौत गुर्दे खराब होने के कारण हुई. चीता नाम के इस चिंपाजी ने 1932 से 1934 तक बनी टार्जन फिल्मों में जॉनी वाइजम्यूलर और मॉरीन ओ सलीवान के साथ काम किया था. इस चिंपाजी को उंगलियों से चित्रकारी करने और फटबॉल का शौक था और उसे क्रिस्टियन संगीत से शांति मिलती थी. चीता को जॉनी वाइजम्यूलर के घर से पाम हार्बर स्थित सैंक्यूरी में 1960 के आसपास लाया गया था. लेकिन टार्जन फिल्मों में काम करने का दावा केवल फ्लोरिडा के चीता नाम के इस चिंपाजी का ही नहीं है.

15 पैसे में एक किलोमीटर का सफर

महंगाई के इस दौर में 15 पैसे में क्या मिलता है. यहां तो 15 पैसे में एक किलोमीटर सफर की पूरी गारंटी दी जा रही है. उद्यमी गुरवंत सिंह ने बैटरी से चलने वाली टू-सीटर कार बनाई है. उनका दावा है कि यह कार 17 रुपये में चंडीगढ़ और 42 में दिल्ली का सफर तय कर सकती है. भारती एनर्जी व बॉयलर कंपनी के डायरेक्टर गुरवंत सिंह ने बताया कि एक बार इसे पूरी तरह चार्ज करने पर यह 60 किलोमीटर तक का सफर तय कर सकती है. इसकी बैटरी चार्ज होने में 5 से 10 घंटे लेती है. गुरवंत ने बताया कि इस कार में आॅटोमेटिक गियर्ड मोटर लगी हुई है, जिससे चालक को गियर बदलने की कसरत नहीं करनी पड़ेगी. वहीं, इसमें मैकेनिकल व इलेक्ट्रो मैग्नेटिक ब्रेक लगे हैं. इससे कार को तुरंत कंट्रोल किया जा सकेगा. गुरवंत के मुताबिक इस कार को बनाने में उन्हें लगभग एक साल का समय लगा है और ढाई लाख रुपये खर्च हुए हैं.

पेट से निकला खजाना

421 सिक्के, 196 नट, 17 बोल्ट और तीन लोहे की चाबियाँ कोई अलमारी की दराजÞ में रखी हुईं चीजÞें नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में 28 वर्षीय कुलेश्वर सिंह के पेट से निकला सामान है. तीन घंटों तक चले आपरेशन के बाद डाक्टरों नें कुलेश्वर के पेट से 6 किलो से भी ज्यादा लोहा निकाला है. कुलेश्वर मानसिक रूप से कमजÞोर है. वह लंबे समय से पेट में दर्द की शिकायत करता रहता था. जिसकी जांच करने पर परीक्षण की रिपोर्टों में अंतड़ियों में रुकावट की बात सामने आई. श्रृष्टि मेडिकल अस्पताल और शोध संस्थान के डाक्टरों ने जब रविवार को कुलेश्वर का आपरेशन किया तो वह दंग रह गए. तीन घंटों तक चले आपरेशन में एक के बाद सिक्के, नट और बोल्ट निकलते चले गए. आॅपरेशन करने वाले डॉक्टर एसएन यादव हैं. कुलेश्वर की पत्नी कुसुम का कहना है कि उसने यह सबकुछ कब खाया इसका पता नहीं चल पाया. परिवार वाले कहते हैं कि वह भी इससे अचंभित हैं.

ठंड में गरम जल से नहाते हैं महाकाल!

ठंड के दिनों में भगवान महाकाल गरम जल से नहाते हैं. मंदिर में नियमित होने वाली भस्म आरती, दद्योदक व भोग आरती में पंचामृत पूजन के पश्चात राजाधिराज को ठंड न लगे, इसलिए पंडे-पुजारी गरम जल चढ़ाकर स्रान कराते हैं. ठंड के दिनों में यह व्यवस्था कार्तिक मास से शुरू होकर चार महीने निरंतर चलती है. यहीं नहीं शिव की दिनचर्या में भी बदलाव हो जाता है. भोग आरती आधे घंटे देरी से शुरू होती है. यानी ठंड में बाबा महाकाल देर से भोजन करते हैं. ठंडक को देखते हुए आरतियों के समय में आधे घंटे का परिवर्तन हो जाता है. नियमित श्रद्धालु परिवर्तित समय अनुसार ही दर्शन के लिए आते हैं.
साल में 2 बार बदलती है व्यवस्था-साल में दो बार शीत व ग्रीष्म ऋतु परिवर्तन के समय भगवान की दिनचर्या बदलती है. चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से आश्विन शुक्ल पूर्णिमा व कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा तक व्यवस्थाएं चलती हैं. ऋतु के अनुसार पुजारी बाबा की सेवा करते हैं.
ठंड के दिनों में बादाम का हलवा-ठंड के दिनों में भगवान को नियमित रूप से भोग में गरम सामग्री परोसी जाती है. भोग की थाली में रोटी, नमकीन भजिए के साथ मीठे में बादाम व कई तरह के हलवे और मौसमी सब्जियों में खासकर मैथी की सब्जी परोसी जाती है.

आदिवासी महिला हिरासत में प्रताड़ित

माओवादियों के साथ संबंध होने के आरोप में छत्तीसगढ़ की जगदलपुर जेल में बंद आदिवासी महिला सोनी सोरी के वकील के मुताबिक सोरी की मेडिकल जांच से पुलिस द्वारा हिरासत में प्रताड़ना के सबूत मिलते हैं. सोरी के वकील, कोलिन गोन्जÞाल्विस के अनुसार जांच रिपोर्ट में साफ तौर पर लिखा है कि सोरी के गुप्तांगो में पत्थर पाए गए हैं और उन्हें गहरी चोटें लगी हैं, ये सीधे तौर पर दर्शाता है कि उनके साथ हिरासत में प्रताड़ना की गई है. सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार से जवाब तलब किया है और फिÞलहाल सोरी को जगदलपुर जेल से निकालकर रायपुर सेन्ट्रल जेल में रखे जाने का आदेश दिया है. कोलिन ने कहा कि सोरी ने एक पुलिसकर्मी का नाम भी अदालत को बताया है और उसके खिलाफ कार्रवाई की मांग की है.
माओवादी होने का आरोप
प्राइमरी स्कूल में अद्यापिका, सोनी सोरी को पांच अक्तूबर को क्राइम ब्रांच और छत्तीसगढ़ पुलिस के संयुक्त अभियान में दिल्ली से गिरफ्Þतार किया गया था. उनपर माओवादियों के साथ संबंध होने के आरोप है.

धूल खा रही तोपें

कुछ समय पहले ही मैंने जबलपुर स्थित आडिनेंस फैक्ट्री से रायपुर नगर निगम आयी तोपों के बारे में लिखा था कि इन तोपों का हम सम्मान नहीं कर सकते तो मंगवाया ही क्यों? यदि मंगवा लिया है तो उसे कहां रखा जाएगा? जवाब मिला कि नगर निगम के मुख्य द्वार में इन दोनों तोपों को रखा जाएगा. आज ये तोपें धूल खाती कचरे की तरह एक कोने में पड़ी हुई है. जानकारी मिली है कि 26 जनवरी के दिन इसका लोकार्पण किया जाएगा. मैं आपको फिर कहती हूं कि लोकार्पण के बाद भी इसकी दशा में कोई परिवर्तन नहीं आयेगा. ये आज भी धूल खा रही हैं कल भी धूल खायेंगी. पहली बार जब मैंने इन ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया था तब भी सलाह दी थी कि इसे पुलिस विभाग या सैनिक प्रशिक्षण केन्द्र को सौंप दिया जाए, ताकि वहां इसका सम्मान बना रहे.

बेटी जंजीर में

दुर्ग जिले के कुसमी निवासी 54 साल के बरतिया मेहर, उनकी पत्नी मुन्नी बाई मेहर और बेटी गिरजा सिर्फ इसलिए बेघर-बार होकर जिल्लत की जिन्दगी बसर कर रहे हैं क्योंकि गिरजा (25 वर्ष) मानसिक रप से अस्वस्थ्य है, जिसे प्रेत बाधा होना बता कर एक बाबा द्वारा दिए गये जंजीर से जकड़ दिया गया है. गिरजा का बचपन तो ठीक-ठाक गुजर गया पर जब गिरजा 13 साल की हुई और जब-तब उसे दौरा पड़ने लगा तो गांववालों ने उसे जादू-टोना होना और बाबा-पीर के पास बाधा दूर करने की सलाह दी. यह परिवार गांववालों से भी प्रताड़ित होता रहा, क्योंकि गिरजा को कभी भी दौरा पड़ जाता था और वह हिंसक हो जाती है. गरीब और अशिक्षित बरतिया और मुन्नी बाई ने इलाज के लिए सहारा लिया बैगा-गुनिया का. इन सब के चलते आज तीन जिन्दगी कष्ट उठा रही है और सहानुभूति से मिले अन्न या चंद सिक्कों से अपने खाने-पीने का जुगाड़ कर रहा है. 12 साल से गिरजा एक जंजीस से बंधी हुई है, जिसका एक सिरा उसके पिता थामे रहते हैं. दुख होता है कि इतने समाज सेवी संगठन रायपुर में हैं, जो सांस्कृतिक कार्यक्रम करा उन्हें इनाम बांट कर विभिन्न अखबारों में जगह  बना समाज सेवा का दंभ भरती है, पर जिन्हें सचमुच सेवा देने की आवश्यकता होती है, उससे मुह मोड़ लेती है. इन्हें इलाज के लिए कोई सेवा संगठन अस्पताल क्यों नहीं ले जा रहा है? क्या चंद सिक्के उछाल कर इनकी झोली में डाल देने से इनकी स्थिति बदल सकती है?